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व्योमेश शुक्ल

स्पंदन डेस्क
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वाराणसी की धरती से निकले चर्चित कवि, आलोचक और रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल अपने समय की बेचैनियों और जन-सरोकारों के कवि हैं। उनकी कविताओं में शहर का भूगोल, अतीत और मुश्किलें दर्ज हैं तो रंगकर्म में समाज का यथार्थ।
‘फिर भी कुछ लोग’ और ‘काजल लगाना भूलना’ जैसे चर्चित काव्य-संग्रहों से लेकर आलोचनात्मक लेखन और अनुवाद की दुनिया तक—व्योमेश ने हिंदी कविता और गद्य को नई दृष्टि और जीवंतता दी है। नॉम चोमस्की, एडवर्ड सईद और महाश्वेता देवी जैसे लेखकों का अनुवाद करके उन्होंने हिंदी पाठकों के लिए नई खिड़कियाँ खोलीं।
आज के दौर में कविता और रंगकर्म, दोनों ही सिर्फ कलात्मक अभ्यास नहीं बल्कि ज़रूरी प्रतिरोध और संवाद का हिस्सा हैं। इन्हीं सवालों पर व्योमेश शुक्ल को सुनना हमारे समय को समझने और उससे मुठभेड़ करने जैसा है

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