स्पंदन डेस्क, कुछ फिल्में अपने समय की लोकप्रियता से आगे निकलकर सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं. कमाल अमरोही की 1972 में प्रदर्शित ‘पाकीज़ा’ ऐसी ही फिल्मों में शामिल है. मीना कुमारी के अभिनय, संगीत, परिधानों और लखनऊ की ढलती नवाबी दुनिया के चित्रण ने इसे हिंदी सिनेमा की विशिष्ट कृतियों में जगह दिलाई.
अब इस फिल्म को डिजिटल तकनीक के जरिए पुनर्स्थापित किया गया है. फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और अमरोही परिवार से जुड़े प्रयासों के तहत करीब दो वर्षों तक चले इस काम में पुराने और क्षतिग्रस्त फिल्म-सामग्री से मूल दृश्य संसार को बचाने की कोशिश की गई. पुनर्स्थापित संस्करण की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति अक्टूबर में फ्रांस के ल्यों में आयोजित Festival Lumière में निर्धारित है. इसके बाद लंदन के BFI London Film Festival में भी इसकी विशेष स्क्रीनिंग होनी है.
फिल्मों का संरक्षण केवल पुरानी तस्वीरों को साफ करने का तकनीकी काम नहीं है. सेलुलॉइड पर दर्ज दृश्य, संगीत, अभिनय और कैमरे की भाषा एक दौर के सामाजिक सौंदर्यबोध का दस्तावेज होते हैं. यदि मूल फिल्म नष्ट हो जाए, तो उसका डिजिटल संस्करण भी हमेशा के लिए खो सकता है.
भारत में सिनेमा का विशाल इतिहास है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा संरक्षण की चुनौतियों से जूझता रहा है. कई फिल्में खराब प्रिंट, नमी, अनुचित भंडारण और समय के कारण क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं.
‘पाकीज़ा’ की वापसी हमें याद दिलाती है कि सिनेमा का भविष्य बनाने के लिए उसके अतीत को बचाना भी जरूरी है.
अब सवाल यह है कि क्या भारत अपने सिनेमाई इतिहास को बचाने के लिए पर्याप्त निवेश और संस्थागत प्रयास कर रहा है?
54 साल बाद ‘पाकीज़ा’ की नई जिंदगी: पुरानी फिल्मों को बचाना क्यों जरूरी है?
