गर्मियों में जब मॉर्निंग स्कूल होता था , माँ भात को दोपहर में पानी में डाल कर रखा दिया करती थी. चिलचिलाती दोपहरी में लौटता तो वही भात छानकर देती. प्याज़ काट कर भरुआ मरिचा (मिर्च का अचार) के साथ भात सान देती. उस स्वाद का तो पूछिए मत लेकिन चावल एकदम ताज़ा लगता. टटका से कहीं अधिक आस्वाद लिए हुए. यतीश कुमार का ‘बोरसी में आँच’ पढ़ते हुए मुझे कंटेंट में ग़ज़ब की ताज़गी महसूस होती रही. माँ का वह भात याद आ गया. संस्मरणों के लिए किसी व्याकरण या व्यवस्था के पक्ष में मैं कभी नहीं रहा. भोक्ता का साहित्यिक विवेक ही उसका कथानक तैयार करता है. ‘ बोरसी भर आँच’ इसका प्रतिबिम्बन करता है. कथ्य और सत्य में न्यूनतम अंतर की यतीश कुमार की चेष्टा ही उनकी लेखकीय ईमानदारी है. “उकेरता हूँ ख़ुद को उतना ही,जितना सच बचा है मेरे अंतस में”. यतीश कुमार की कविता का यह अंश उनके साहित्यिक अवदान का बीज मंत्र है. अभाव और संघर्ष से उपजा हिंदी का समाज अपने अनुभव की कूची से समय की दीवार पर जीवन का बहुअर्थी म्यूरल बनाता है. इसमें एक व्यक्ति नहीं एक बड़े समुदाय का सत्य उपस्थित होता है.
‘स्पंदन’ के मंच से यतीश कुमार जब पिछले तीन दशकों में हिंदी समाज में आए बदलाओं की यात्रा करेंगे और देश के परिप्रेक्ष्य में उसकी मीमांसा करेंगे तो ज़ाहिर है कई रहस्योद्घाटन होंगे

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