हिंदी में ग़ज़लों के मर्म और धर्म को सहेजने वाले साहित्यकार बहुत कम है. प्रताप सोमवंशी उन थोड़े से शायरों, कवियों में आते हैं. जिस आसानी से वे गहरी बातें कह जाते हैं, वह दुष्कर है. उनके मूल्यांकन का यह पहला आधार भी है. प्रताप सोमवंशी भाषा आम आदमी की बोलचाल से उठाते हैं. यह सरलता उनकी कविताओं, ग़ज़लों की शक्ति है. सक्रिय पत्रकारिता में रहते हुए साहित्य कर्म से गहरे जुड़ा रहना उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है. और यह भी सच है कि पत्रकारिता से वे अपनी कविताओं, ग़ज़लों के लिए कच्चा माल उठाते हैं. ‘स्पंदन’ के मंच से प्रताप सोमवंशी के साथ समकालीन प्रश्नों पर विमर्श उनके अनुभव संसार तक जाने का रास्ता देगा.

