समकालीन हिंदी रचना और कला कर्म की परिधि में वांछनीय और परिवर्तनकारी बहुत कुछ हो रहा है. रचनाकारों और कलाकारों के बीच वैचारिक उथल-पुथल और टकराव, कुछ वर्षों से अधिक मुखर रहे हैं. समाज की जीवंतता और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन के लिए यह मुखरता प्राण वायु की तरह है.
‘स्पंदन’ मौजूदा दौर में एक अपरिहार्य प्रयोग की तरह है. नितांत अनावश्यक और भड़काऊ मुद्दों पर होनेवाली टीवी और ग़ैर टीवी बहसों ने समाज में कई तरह के विरूपण पैदा किए हैं. ‘स्पंदन’ इसमें एक सायास हस्तक्षेप है. समसामयिक प्रश्नों पर सार्थक और विचारोत्तेजक विमर्श-शृंखला का मंच है ‘स्पंदन’.
इसका पहला और उद्घाटन संस्करण हिंदी साहित्य और कला के प्रमुख रचनाकारों कलाकारों से स्पंदित होगा. 26 सितंबर को दिल्ली में इसका आयोजन प्रस्तावित है. आज से अतिथियों से परिचय का क्रम शुरू हो रहा है.
नीलोत्पल मृणाल हिंदी मंच और साहित्य दोनों आज काफ़ी लोकप्रिय हैं. उनके उपन्यास और कवितायें अपने खाँटीपन और नयेपन के लिए चर्चा बटोरती रही हैं.

