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मीरा की धरती पर फिर गूंजेंगे भजन: चित्तौड़गढ़ में होगा मीरा महोत्सव

स्पंदन डेस्क
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स्पंदन डेस्क, राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति में मीरा सिर्फ एक संत-कवयित्री नहीं हैं. वह प्रेम और भक्ति में सराबोर सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध अपने समय की एक असाधारण स्त्री की आवाज भी हैं.

इसी विरासत को याद करते हुए चित्तौड़गढ़ में 25 और 26 अक्टूबर को मीरा महोत्सव आयोजित किया जाएगा. दो दिन चलने वाले इस आयोजन में संगीत, कविता, भक्ति और राजस्थान की लोक परंपराओं का संगम देखने को मिलेगा.

मीरा की रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी सरलता है. वह दार्शनिक बात भी ऐसी भाषा में कहती हैं जिसे आम आदमी गा सके. शायद इसी कारण से सदियों बाद भी उनके पद मंदिरों से निकलकर लोक गायकों, शास्त्रीय संगीतकारों और आधुनिक कलाकारों तक पहुंचते रहे हैं.

आज जब लोक परंपराओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका व्यावसायिक मनोरंजन में बदल जाना है, ऐसे आयोजन एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाते हैं—क्या हम अपनी परंपराओं को सिर्फ उत्सव के रूप में देख रहे हैं या उनके भीतर छिपे विचार को भी समझ रहे हैं?

मीरा को याद करना सिर्फ भजन गाना नहीं है. यह उस आवाज को याद करना है जिसने अपने समय की सीमाओं से बाहर जाकर प्रेम और स्वतंत्रता को अपना रास्ता बनाया.

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