स्पंदन डेस्क, दिल्ली का अक्षरा थिएटर इन दिनों अपने अस्तित्व को लेकर चिंता में है। बाबा खड़क सिंह मार्ग पर 1980 के दशक से मौजूद यह जगह भारतीय रंगमंच के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक ठिकानों में रही है। अब जिस जमीन पर यह थिएटर खड़ा है, उसे राम मनोहर लोहिया अस्पताल के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव सामने आया है।
अक्षरा सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है। इसका इतिहास उस दौर तक जाता है जब रंगमंच सत्ता पर सवाल पूछने का साहस करता था। आपातकाल के दौरान यहां व्यंग्यात्मक नाटक ‘Let’s Laugh Again’ का मंचन हुआ था। उस समय जब राजनीतिक माहौल में हंसना भी जोखिम भरा था, थिएटर ने दर्शकों को हंसने की जगह दी।
आज परिस्थितियां अलग हैं। अस्पताल का विस्तार भी सार्वजनिक जरूरत है और सांस्कृतिक संस्थान को बचाना भी। यही इस विवाद को कठिन बनाता है।
शहर जब बढ़ता है तो सड़कें, अस्पताल और इमारतें जरूरी होती हैं। लेकिन शहर की पहचान सिर्फ उसके कंक्रीट से नहीं बनती। उसके थिएटर, पुस्तकालय, कला केंद्र और सांस्कृतिक स्थल भी उसकी स्मृति होते हैं।
अक्षरा का सवाल इसलिए सिर्फ एक इमारत का सवाल नहीं है—यह सवाल है कि विकास की दौड़ में शहर अपनी सांस्कृतिक स्मृति के लिए कितनी जगह बचाता है।

