स्पंदन डेस्क, कहानी कहने के लिए हमेशा कैमरे या मोबाइल की जरूरत नहीं होती. कभी एक कपड़े की गुड़िया, कुछ धागे और एक कलाकार की आवाज भी पूरी दुनिया रच देते हैं.
मध्य प्रदेश में आयोजित होने वाला ‘पुतुल समारोह’ भारत की इसी पुरानी परंपरा को सामने लाता है. जनजातीय लोक कला और बोली विकास अकादमी से जुड़ा यह आयोजन कठपुतली कला के जरिए लोककथाओं, इतिहास, पौराणिक कथाओं और सामाजिक विषयों को दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश करता है.
भारत में कठपुतली सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रही है, बल्कि गांवों और कस्बों में शिक्षा, नैतिक संदेश और सामुदायिक संवाद का जरिया भी रही है. कलाकार अपने पात्रों के जरिए राजा से लेकर आम आदमी तक की कहानी कहते रहे हैं.
डिजिटल मनोरंजन के दौर में यह कला स्वाभाविक रूप से कठिन दौर से गुजर रही है. लेकिन कठपुतली की खूबी यह है कि इसमें तकनीक से ज्यादा कलाकार की कल्पना काम करती है. एक धागा खिंचता है और निर्जीव पुतला अचानक जीवित हो उठता है. शायद यही लोक कला का जादू है—कम साधनों में भी वह दर्शक की कल्पना को पूरा संसार दे देती है.
