हमारे बारे में

 हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, एक पुरानी और सम्पन्न संस्कृति भी है. यह अभिव्यक्ति के लिए शब्द ही नहीं देती बल्कि अचार, विचार, व्यवहार, सोच, संस्कार, पसंद सभी का साँचा भी गढ़ती है. इसी आधार पर एक पहचान का निर्माण होता है. इसे हिंदी समाज कहते हैं. एक परंपरा, परिवेश और संस्कृति में रचा बसा विशाल समुदाय. भारत की बहुविध संस्कृति और बहुलताओं का मूल स्वर. प्राणवायु.

मैंने ‘स्पंदन’ के लिए हिंदी को इसी अर्थ में रखा है. ‘हिंदी’ की समृद्धि और विस्तार भारत की सबलता और समरसता के पोषक-तत्व हैं. साहित्य, सिनेमा, मीडिया (सोशल मीडिया समेत) सरकारों के प्रयास, प्रवासी हिंदी समाज और हिंदी के लोक (गीत, कला, पर्व आदि) जैसे माध्यमों की ‘हिंदी’ के विकास-विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ‘स्पंदन’ हिंदी समाज और उसकी संस्कृति के प्रवाह, विस्तार और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान को चिह्नित करने का प्रयास है. समय के साथ आए दबावों और बदलावों पर भी गंभीर चर्चा सर्वथा आवश्यक है.

हिंदी जो एक सांस्कृतिक पहचान है,उसकी आत्मा हिंदी भाषा है. कई राजनीतिक कारणों से हिंदी को वह गति नहीं मिली जो मिलनी चाहिए. हाल ही में महाराष्ट्र में हिंदी विरोध सर्वथा अनुचित था. दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में हिंदी त्यक्त और तिरस्कृत रही है. डिजिटल दुनिया, निजी स्कूलों और बाहरी प्रभावों के कारण भी हिंदी के सामने कुछ गंभीर प्रश्न खड़ा हुए हैं.

‘स्पंदन’ हिंदी भाषा, समाज और उसकी संस्कृति के प्रवाह, विस्तार और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान को चिह्नित करने का प्रयास है. ‘स्पंदन’, ‘हिंदी’ की उपलब्धि, संभावना और चुनौती पर परिचर्चा के साथ-साथ हिंदी समाज के ख़तरों पर विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच है.

यह मंच आपका है. हम सभी का है. आपका साथ, सहयोग और समर्थन के लिए ‘‘स्पंदन’ का निमंत्रण स्वीकार करें.

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