देश की संसद से लेकर आम आदमी की बैठकियों तक में नवाज़ देवबंदी के शेर पढ़े जाते हैं. सड़क से संसद तक की ऐसी आवाज़ जब कोई शायर बनता है तो ज़ाहिर है वह आम आदमी की आवाज़ होता है. नवाज़ देवबंदी जब लिखते हैं “भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए, माँ ने फिर पानी पकाया देर तक” तो वह भूख और विपन्नता की ग्लोबल पीड़ा को अंतस्-अनुभूति तक ले जाते हैं. एक छटपटाहट पैदा करते हैं. हाल और सवाल की कैफ़ियत, इतनी किफ़ायत से रखने का सामर्थ्य विरले दिखता है. पिछले पांच दशक से नवाज़ देवबंदी ने भारतीय समाज की धड़कन के पड़ोस में अपना ठिकाना बना रखा है. हर हरकत को ना सिर्फ़ महसूस करते हैं,बल्कि उसकी शिनाख्त भी करते हैं.
नवाज़ देवबंदी यह लिख कर कि “ सफ़र में मुश्किलें आएं तो जुर्रत और बढ़ती है, कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है” ना सिर्फ़ अपनी तबीयत की तासीर बताते हैं बल्कि आम आदमी के हौसले को भी अना देते हैं. हिंदी पट्टी का शायर होने के नाते नवाज़ देवबंदी के लिखे में यहीं के गाँव-शहर, बाज़ार-ख़रीदार, रस्मो-रिवाज, मिट्टी-हवा-पानी मिलते हैं और भरपूर. उर्दू का शायर हिंदीपन को जीता रहा है.
नवाज़ साहब की कीर्ति पताका भारत ही नहीं, बाहर के देशों में भी लहराती है. ज़ाहिर है हिंदी के बड़े समाज ने बदलाव और बेहतरी के साथ कितना संतुलन रखा है और कितना लड़खड़ाया है, इस पर साधिकार राय रखने के वे अधिकारी हैं. नवाज़ साहब का उनकी क़द्दावर कलम की ताज़ातरीन ग़ज़लों के साथ ‘स्पंदन’ अभिनंदन करता है.

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