दो दशक से अधिक शानदार, धारदार पत्रकारिता के बाद गीताश्री लेखन की तरफ़ मुड़ीं. जैसे बाँध की पीठ से लगकर बैठा पानी रास्ता मिलते ही शक्तिशाली गति पकड़ता है, गीताश्री का लेखक ठीक वैसे ही उपन्यासों और कहानी संग्रहों में उतरता चला गया. और वह कई और कथानक लिए बैठा है.
गीताश्री के लेखकीय क़द का अंदाज़ा आपको वन्दना राग की इस टिप्पणी से होता है- “गीताश्री हमारे समय की एक विशिष्ट रचनाकार हैं. पत्रकारिता के प्रशिक्षण ने उन्हें एक ऐसी सूक्ष्म दृष्टि प्रदान की है, जो उनके थीम्स के चयन के मार्फ़त हमें चौंकाती है और एक नई दुनिया को बिना किसी मिलावट के हमारे सामने नग्न कर देती है. समाज की रूढ़ियों, वर्जित विषयों और हाशिये पर खड़े लोगों पर गीताश्री ने संवेदनशील कहानियां लिखी हैं”.
स्त्री देह और मन पर आधिपत्य गाँठने की पुरुषवादी प्रवृत्ति के विरुद्ध युद्धरत गीताश्री के सामने कुछ समय-उपजे प्रश्न रखे जा सकते हैं. मसलन, आधुनिक समाज में महिलाओं का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ है जो उसी पुरुषवादी मानसिकता से संक्रमित है, जिसके विरुद्ध स्त्रीवाद खड़ा हुआ. बाज़ार, उत्पाद और सूचना-तकनीक ने नई पीढ़ी की लड़कियों-महिलाओं के ज़रिए भी सांस्कृतिक अस्मिता के मूल्यों पर हमला शुरू किया है. और स्त्री स्वातंत्र्य अब स्वच्छंदता से एकाकार किया जा रहा है. इसमें देह-मुक्ति की अराजकता ध्वनित होती है.
स्पंदन का मंच ऐसे अनेकानेक प्रश्नों के लिए गीताश्री का स्वागत करता है

