अज्ञेय ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि “मैंने पढ़ने-लिखने के साथ-साथ आत्म- प्रशिक्षण और हाथ के प्रशिक्षण में भी अधिक समय बिताया. जैसे, मैं कपड़े सील लेता हूं, जूते गांठ लेता हूं, फ़र्नीचर जोड़ लेता हूं, मिठाई-पकवान बना लेता हूं, जिल्दबंदी कर लेता हूं, विलायती ढंग के बाल काट सकता हूं, प्रेस-मशीन चला लेता हूं, फावड़ा, कुल्हाड़ी, गैली बना लेता हूँ. निराई कर लेता हूं, बन्दूक-पिस्तौल चला लेता हूं, फ़ोटो खींच लेता हूं, फ़िल्म और प्रिंट डेवलेप कर लेता हूं, तैर लेता हूं, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिंटन खेल लेता हूं. अधिकांश के सहारे आजीविका कमा सकता हूं”.

मैं कुछ ऐसा ही प्रो. पुष्पेश पंत के बारे में सोचता हूँ. प्रोफ़ेसर अंतर्राष्ट्रीय मामलों के, ज्ञाता इतिहास के भी, जहान भर के पकवान के विशेषज्ञ, साहित्य और पत्रकारिता में भी माहिर और धर्म अध्यात्म के भी पंडित. इसके अलावा भी बहुत कुछ.
प्रो. पुष्पेश पंत, भाषा का वाचन पक्ष कितना सुगढ़ और प्रभावी हो सकता है इसका भी प्रतिमान हैं. उनकी ख्याति व्यंजनों की अगाध और रोचक जानकारी के कारण भी है. इस प्रतिभा का कोई सानी नहीं. हिंदी समाज, अपनी परंपरा में व्यंजनों के साथ कैसा प्रयोग करता रहा, अपनाता भी रहा और आज जिस रूप में हमारे सामने है, उसका इतिहास क्या रहा है – इस पर प्रो. पुष्पेश पंत को सुनना कई अद्भुत प्रसंगों से गुज़रना होगा. स्पंदन’ का मंच आपकी प्रतीक्षा में है.

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