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दिनेश कुशवाह

स्पंदन डेस्क
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दिनेश कुशवाह से मेरा मिलना 1993 में हुआ. मैंने बीएचयू में दाखिला लिया था और वे वहाँ पीएचडी कर रहे थे. हंस और दूसरी साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कवितायें छप चुकीं थीं, छप रहीं थीं, इसलिए मैं जानता था. एक रोज़ मैं और मेरा मित्र साइकिल से लंका (बीएचयू के मैं गेट के बाहर का मार्केट) जा रहे थे तबतक साँझ के झुटपुटे में दिनेश जी बिरला हॉस्टल के सामने पैदल टहलते दिखे. हमलोग साइकिल से उतरे, उनको रोका, पूछा आप दिनेश कुशवाह हैं? बोले – हाँ. फिर एक रिश्ता थोड़ी देर की उस बातचीत से बना और वे दिनेश भैया हो गए. आजतक उनकी स्नेह-वर्षा का सौभाग्य लूट रहा हूँ.
दिनेश कुशवाह रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष हैं. वे कवि के साथ साथ अद्भुत शैली के शिक्षक और प्रखर वक्ता भी हैं. उनकी कविताएँ चौंर में बासमती धान के खेत की तरह हैं. खुशबू ही पगडंडी से खेत तक पहुँचा देती है. गाँव से जो शब्द संपदा और परिवेश लेकर वे चले उनकी उपस्थिति कविताओं में मिलती है. वही उनकी शिनाख्त देते हैं. वे इसी काया में मोक्ष का अद्वैत रचते हैं और नीत्शे का ईश्वर का अंत भी उनके यहाँ मुखरित होता है. दिनेश कुशवाह इतिहास, दर्शन, रूपक और बिम्ब आदि का औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं, उनसे कुछ नया सिरजते हैं. दरअसल डर और उम्मीद के बीच हाशिए के समाज की चिंताओं से जूझते वे दिखते हैं. उनके यहाँ प्रेम भी हाशिए का एक तबका है.
प्रेम को लेकर हिंदी समाज का मन और मानस पर दिनेश कुशवाह को सुनना रोमांचकारी होगा.

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